नेतागिरी बनाम रीलबाजी:सड़क बाद में बनेगी, रील पहले बनेगी! नई राजनीति का नया फॉर्मूला…..क्या नेता अब इन्फ्लुएंसर बन चुके हैं?…….विस्तार से पढ़ें

रवि प्रकाश | डिजिटल डेस्क | दुर्ग: भारतीय राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक समय था जब नेता अपने कामों से पहचाने जाते थे। सड़क बनी तो लोग याद रखते थे, अस्पताल खुला तो जनता उसका लाभ उठाती थी, पानी की समस्या हल हुई तो नेता की छवि मजबूत होती थी। लेकिन अब लगता है कि राजनीति का नया मंत्र बदल गया है — “काम करो या मत करो, बस कैमरे में दिखना चाहिए।”

आज सोशल मीडिया ने राजनीति का चेहरा पूरी तरह बदल दिया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म नेताओं के नए चुनावी मैदान बन चुके हैं। कई नेताओं के लिए अब जनता से ज्यादा महत्वपूर्ण कैमरा और कंटेंट दिखाई देता है।

कभी नेता जनता के बीच जाकर समस्याएं सुनते थे, आज कई जगह ऐसा लगता है कि पहले कैमरा ऑन होता है, फिर जनसंपर्क शुरू होता है। गड्ढे वाली सड़क पर खड़े होकर वीडियो, गरीब को कंबल देते हुए रील, पौधारोपण की स्लो-मोशन क्लिप, बैकग्राउंड में देशभक्ति संगीत और फिर सोशल मीडिया पर अपलोड। सवाल यह है कि क्या यह जनसेवा है या डिजिटल ब्रांडिंग?

आने वाले समय को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव विकास कार्यों के आधार पर जीते जाएंगे या सोशल मीडिया की पहुंच और वायरल कंटेंट के दम पर? क्या जनता को यह बताया जाएगा कि शहर में कितनी सड़कें बनीं, कितने स्कूल सुधरे, कितने अस्पताल विकसित हुए? या फिर उन्हें केवल 30 सेकंड की आकर्षक रीलों के जरिए प्रभावित किया जाएगा?

राजनीति में सोशल मीडिया का उपयोग गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब विकास वास्तविकता में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा दिखाई देने लगता है। जब उपलब्धियां जमीन पर नहीं, एडिटिंग सॉफ्टवेयर में पैदा होने लगती हैं। जब नेता की लोकप्रियता उसके काम से नहीं बल्कि उसके वीडियो के व्यूज से मापी जाने लगती है।

आज कई राजनीतिक कार्यकर्ता भी जनता के बीच कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय दिखाई देते हैं। किसी क्षेत्र की समस्या पर आंदोलन करने से ज्यादा ऊर्जा रील बनाने में खर्च हो रही है। ऐसा लगता है कि राजनीति धीरे-धीरे जनसेवा से डिजिटल प्रदर्शन की ओर बढ़ रही है।

सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि जनता भी केवल सोशल मीडिया की चमक-दमक देखकर निर्णय लेने लगे, तो वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, सड़क और कानून-व्यवस्था जैसे विषय ट्रेंडिंग रीलों के शोर में दब सकते हैं।

लोकतंत्र में संवाद जरूरी है और सोशल मीडिया उसका एक मजबूत माध्यम है। लेकिन जब माध्यम ही उद्देश्य बन जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

शायद आने वाले चुनावों में यह लड़ाई केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं होगी। यह लड़ाई “विकास बनाम वायरल कंटेंट”, “जनसेवा बनाम डिजिटल इमेज” और “नेतागिरी बनाम रीलबाजी” के बीच भी होगी।

अंत में फैसला जनता को करना है। वोट सड़क देखकर देना है या स्लो-मोशन वीडियो देखकर। अस्पताल देखकर देना है या इंस्टाग्राम रील देखकर। क्योंकि चुनाव तो पांच साल में एक बार आता है, लेकिन विकास की जरूरत हर दिन होती है।

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