एथेनॉल की नीति ने बढ़ाई आम आदमी की मुश्किलें, महंगी चीनी से और एथेनॉल से पुराने वाहन हो रहे कंडम जनता हो रही परेशान ; सरकार जवाब दे : पूर्व मेयर धीरज बाकलीवाल

डिजिटल डेस्क : दुर्ग। जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग शहर के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने केंद्र सरकार की एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल E20 नीति, लगातार बढ़ती चीनी की कीमतों और इसके चलते मध्यम वर्ग एवं छोटे कारोबारियों पर पड़ रहे अतिरिक्त आर्थिक बोझ को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।

 

धीरज बाकलीवाल ने कहा कि सरकार एथेनॉल नीति को ऊर्जा सुरक्षा और किसानों के हित से जोड़कर प्रचारित कर रही है, लेकिन इसके दूसरे पहलुओं पर सरकार चुप है। आज स्थिति यह है कि एक ओर आम आदमी को महंगी चीनी खरीदनी पड़ रही है, दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और अनाज का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है।

 

उन्होंने कहा कि हालिया आंकड़ों के अनुसार देश में एक वर्ष में लगभग 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ और इसके लिए करीब 1.33 करोड़ टन अनाज का इस्तेमाल किया गया। वहीं लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने लायक गन्ने और उससे प्राप्त संसाधनों को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा गया। इसका सीधा असर चीनी की उपलब्धता और बाजार भाव पर पड़ने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

 

चीनी उत्पादन की जगह एथेनॉल, फिर महंगी चीनी का बोझ जनता पर क्यों?

 

बाकलीवाल ने कहा कि जब देश में चीनी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और बाजार में आम आदमी को महंगी चीनी खरीदनी पड़ रही है, तब सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गन्ने का कितना हिस्सा चीनी उत्पादन में जा रहा है और कितना एथेनॉल के लिए डायवर्ट किया जा रहा है।

 

उन्होंने कहा कि अखबारों में प्रकाशित आंकड़े बताते हैं कि एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण गन्ने के उपयोग का बड़ा हिस्सा ईंधन उत्पादन की तरफ जा रहा है। जब उत्पादन का एक हिस्सा चीनी से हटाकर एथेनॉल की तरफ जाएगा तो बाजार में चीनी की उपलब्धता और कीमत पर उसका असर होना स्वाभाविक है।

 

धीरज बाकलीवाल ने सवाल किया— “जब जनता की रसोई में चीनी महंगी हो रही है, तब सरकार को यह जवाब देना होगा कि प्राथमिकता क्या है—आम आदमी की रसोई या पेट्रोल में एथेनॉल का प्रतिशत बढ़ाना?”

 

मक्का और अनाज भी एथेनॉल की भेंट

 

उन्होंने कहा कि मामला केवल गन्ने तक सीमित नहीं है। एथेनॉल उत्पादन में मक्का और दूसरे अनाजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। यदि बड़ी मात्रा में खाद्यान्न एथेनॉल उद्योग की ओर जाएगा तो उसका असर खाद्य बाजार, पशु आहार और अंततः आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है।

 

1.33 करोड़ टन अनाज के एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल का आंकड़ा अपने आप में सरकार की नीति के पैमाने को दिखाता है। सरकार को देश के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि खाद्यान्न और ईंधन के बीच संतुलन कैसे बनाया जा रहा है।

 

एथेनॉल के साथ पानी का सवाल भी गंभीर

 

धीरज बाकलीवाल ने कहा कि एथेनॉल उत्पादन पर केवल कीमत और पेट्रोल की चर्चा पर्याप्त नहीं है। इसका एक बड़ा सवाल पानी और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है।

 

गन्ने जैसी पानी की अधिक आवश्यकता वाली फसल को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देकर उसके आधार पर एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की नीति पर सरकार को यह बताना चाहिए कि भूजल और जल संसाधनों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव का आकलन किया गया है या नहीं।

 

उन्होंने कहा कि देश के कई हिस्से जल संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्रत्येक क्षेत्र का जल बजट और पानी की उपलब्धता भी सरकार को सार्वजनिक करनी चाहिए।

 

E20 का सबसे बड़ा बोझ मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारियों पर

 

बाकलीवाल ने कहा कि E20 के कारण पुराने वाहनों को लेकर भी लोगों में चिंता बढ़ रही है। 2008-10 के आसपास की पुरानी कारें, बाइक, छोटी मालवाहक गाड़ियां और दोपहिया वाहन आज भी लाखों परिवारों की आजीविका का साधन हैं।

 

किराना दुकानदार से लेकर छोटे व्यापारी तक ऐसे लोग हैं जिनके पास टीवीएस चैंप, छोटी मालवाहक गाड़ी, पुरानी बाइक या पुरानी कार ही उनकी रोजी-रोटी का माध्यम है। वे नई गाड़ी खरीदने की आर्थिक स्थिति में नहीं हैं।

 

“जिस छोटे दुकानदार की दुकान तक माल पहुंचाने वाली गाड़ी ही उसकी रोजी-रोटी है, यदि उसी वाहन की मरम्मत का खर्च बढ़ेगा, माइलेज घटेगा या इंजन संबंधी समस्या आएगी, तो इसका सीधा असर उसके परिवार की आय पर पड़ेगा।”

 

उन्होंने कहा कि सरकार को E20 के प्रभाव को लेकर पुराने वाहनों के लिए स्वतंत्र तकनीकी और आर्थिक अध्ययन कराना चाहिए तथा प्रभावित वाहन मालिकों के हित में राहत की नीति बनानी चाहिए।

 

सरकार को चेतावनी

 

धीरज बाकलीवाल ने केंद्र सरकार से मांग की कि—

 

एथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन और चीनी की कीमतों के बीच संबंध का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए।

 

एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहे मक्का और अन्य अनाज की मात्रा और उसके खाद्य बाजार पर प्रभाव को सार्वजनिक किया जाए।

 

एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत का स्वतंत्र जल एवं पर्यावरण ऑडिट कराया जाए।

 

E20 से पुराने वाहनों पर पड़ रहे तकनीकी और आर्थिक प्रभाव का अध्ययन कराया जाए।

 

मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारियों को होने वाले अतिरिक्त वाहन खर्च से राहत देने के लिए ठोस नीति बनाई जाए।

 

चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए चीनी उत्पादन और एथेनॉल उत्पादन के बीच संतुलन कायम किया जाए।

 

 

धीरज बाकलीवाल ने चेतावनी देते हुए कहा, “सरकार को यह समझना होगा कि देश केवल बड़ी कंपनियों और नई गाड़ियां खरीदने वाले लोगों से नहीं चलता। देश उस छोटे किराना दुकानदार से चलता है जिसकी छोटी गाड़ी उसकी आजीविका है, उस मध्यमवर्गीय परिवार से चलता है जो वर्षों से अपनी पुरानी कार चला रहा है और उस आम गृहस्थ से चलता है जिसकी रसोई में आज चीनी भी महंगी हो गई है। सरकार की नीतियां यदि जनता की जेब, पानी और खाद्य सुरक्षा—तीनों पर एक साथ चोट करेंगी तो कांग्रेस चुप नहीं बैठेगी।”

 

उन्होंने कहा कि एथेनॉल नीति की समीक्षा अब समय की मांग है। सरकार को आंकड़ों और जमीनी हकीकत के आधार पर फैसला लेना चाहिए, क्योंकि ईंधन की जरूरत के साथ जनता की रसोई, पानी, पर्यावरण और रोजी-रोटी की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

 

“जनता को प्रयोग नहीं, राहत चाहिए; भाषण नहीं, जवाब चाहिए और ऐसी नीति चाहिए जिसमें विकास के नाम पर आम आदमी की जेब खाली न हो।”

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