Nag Panchami: नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है? क्या है इसके पीछे की रहस्यमयी पौराणिक कहानी?
डिजिटल डेस्क: नाग पंचमी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध नाग देवता की पूजा और एक रोचक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई थी। अपने पिता की मृत्यु से क्रोधित उनके पुत्र राजा जनमेजय ने संसार के सभी नागों को समाप्त करने के उद्देश्य से विशाल ‘सर्प सत्र महायज्ञ’ का आयोजन किया।
यज्ञ में ऋषियों द्वारा मंत्रों का जाप किया गया, जिसके प्रभाव से अनेक नाग यज्ञ की अग्नि में खिंचे चले आए। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक नाग ने देवराज इंद्र की शरण ली और उनके सिंहासन से लिपट गया। जब तक्षक को भी इंद्र सहित यज्ञ में बुलाने के मंत्रों का जाप होने लगा, तब देवताओं में चिंता फैल गई।
इसी दौरान देवी मनसा के पुत्र और महान ज्ञानी आस्तिक मुनि यज्ञ स्थल पर पहुंचे। अपनी बुद्धिमत्ता और वाणी से उन्होंने राजा जनमेजय को प्रसन्न कर दिया। राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा।
आस्तिक मुनि ने कोई धन-संपत्ति नहीं मांगी, बल्कि राजा जनमेजय से सर्प सत्र यज्ञ रोकने और नागों की रक्षा करने का वरदान मांगा। राजा ने उनकी बात स्वीकार कर यज्ञ समाप्त कर दिया और इस तरह तक्षक नाग समेत अनेक नागों का जीवन बच गया।
मान्यता है कि जिस दिन यह यज्ञ रोका गया, वह सावन शुक्ल पंचमी का दिन था। इसी कारण इस दिन नाग देवता की पूजा की परंपरा शुरू हुई। श्रद्धालु नाग देवता को दूध और जल अर्पित कर सुख-समृद्धि तथा सर्प भय से रक्षा की कामना करते हैं।
नाग पंचमी की यह कथा हमें क्रोध और प्रतिशोध के बजाय करुणा, विवेक और सभी जीवों के प्रति संरक्षण का संदेश देती है।

