दुर्ग में अंधेरे का राज……महापौर अल्का बघमार के 3 महीने पर सवाल — बिजली, स्ट्रीट लाइट, विकास सब गायब
दुर्ग। शहर की जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया था, उम्मीदों से भरी नज़रों से नगर सरकार को देखा था — लेकिन महज 3 महीने में ही लोगों को एहसास होने लगा है कि शायद उन्होंने एक और “खाली वादा” चुन लिया है। दुर्ग शहर इस समय बदइंतज़ामी, बिजली संकट और विकास की खस्ताहाल तस्वीर का आइना बन चुका है। महापौर श्रीमती अल्का बघमार के नेतृत्व में नगर निगम के कामकाज पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

बिजली संकट बना शहर का नया स्थायी सदस्य
दुर्ग की गलियों में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चित मुद्दा है – “बिजली कब जाएगी?” और नहीं तो “कब आएगी?”। हर दिन कई बार बिजली कटौती ने शहरवासियों का जीना मुहाल कर दिया है। सुबह से लेकर रात तक अघोषित कटौती हो रही है, लेकिन नगर निगम और प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं। भीषण गर्मी में बूढ़े, बच्चे, मरीज सभी बेहाल हैं, लेकिन महापौर के बयान अब तक सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित नजर आ रहे हैं।
शहर की गलियों में पसरा अंधेरा, स्ट्रीट लाइटें गायब
कई प्रमुख इलाकों में स्ट्रीट लाइट्स हफ्तों से बंद पड़ी हैं — कुछ जगह तो वर्षों से लाइटें लगी ही नहीं। गंजपारा, रिसाली रोड, सुभाष चौक, नेहरू नगर, स्टेशन रोड जैसी भीड़भाड़ वाली सड़कों पर रात होते ही अंधेरा पसर जाता है। महिलाओं की सुरक्षा, दुर्घटनाएं और चोरी की घटनाएं बढ़ रही हैं — लेकिन निगम प्रशासन मौन साधे बैठा है।
3 महीने, 0 बदलाव — जनता का भरोसा डगमगाया
महापौर अल्का बघमार को कार्यभार संभाले अब तीन महीने हो चुके हैं। इन 90 दिनों में कोई ठोस काम दिखाने की जगह नगर निगम सिर्फ बधाई पोस्टर, झंडा लहराने की राजनीति और आपसी गुटबाज़ी में उलझा रहा। जनता यह पूछने लगी है कि “क्या यही स्मार्ट सिटी का सपना था?” क्या निगम के ऑफिस में बैठकर मीटिंग और होर्डिंग ही विकास का नया नाम है?
न विकास, न जवाबदेही — बस दिखावा ही दिखावा
नगर सरकार से जुड़े हर विभाग में तालमेल की कमी है। शिकायतों का निवारण ना के बराबर है। वार्ड पार्षदों के पास बजट नहीं, और अधिकारी समाधान की जगह टालमटोल में लगे हैं। महापौर हर जगह “मीडिया फ्रेंडली” चेहरा दिखाने में व्यस्त हैं — लेकिन जनता के सवालों से बचती नजर आ रही हैं।
जनता का सवाल सीधा है – कब मिलेगा उजाला?
अब जनता महापौर से सिर्फ जवाब नहीं, काम चाहती है। दुर्ग की गलियों में घना अंधेरा है, घरों में बिजली नहीं, और सिस्टम में जवाबदेही नहीं। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में नाराज़ जनता का गुस्सा सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगा

