दुर्ग नगर निगम में गुटबाजी की राजनीति चरम पर! जनता ने शहर के विकास के लिए चुना, नेता आपस में उलझे; अब बिजली के लिए पार्षद को धरने पर बैठना पड़ रहा है।
दुर्ग नगर निगम में गुटबाजी की राजनीति चरम पर! जनता ने शहर के विकास के लिए चुना, नेता आपस में उलझे; अब बिजली के लिए पार्षद को धरने पर बैठना पड़ रहा है।
छह महीने से वार्ड में स्ट्रीट लाइट बंद होने का आरोप, पार्षद ने विद्युत विभाग में दिया धरना; महापौर ने ठेकेदार कंपनी को ठहराया जिम्मेदार। आखिर नगर निगम की राजनीति में पिस कौन रहा है? जवाब है- शहर की जनता!
डिजिटल डेस्क दुर्ग: दुर्ग नगर निगम में इन दिनों विकास की राजनीति कम और गुटबाजी की राजनीति ज्यादा दिखाई दे रही है। शहर की जनता ने अपने वार्डों और शहर के विकास की उम्मीद लेकर जनप्रतिनिधियों को चुना था। लोगों ने अपना कीमती वोट इसलिए नहीं दिया था कि चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि आपसी खींचतान, राजनीतिक वर्चस्व और गुटों की लड़ाई में उलझे रहें।
लेकिन मौजूदा हालात कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। शहर की बुनियादी समस्याओं का समाधान करने के बजाय यदि जनप्रतिनिधियों को अपनी ही व्यवस्था के खिलाफ धरने पर बैठना पड़े, तो समझा जा सकता है कि नगर निगम के भीतर तालमेल और जवाबदेही की स्थिति क्या है।
ताजा मामला दुर्ग नगर निगम के वार्ड क्रमांक 34 का है, जहां पार्षद कमल देवांगन अपनी मांगों को लेकर नगर निगम के विद्युत विभाग में धरने पर बैठ गए। पार्षद का आरोप है कि उनके वार्ड में पिछले करीब छह महीने से स्ट्रीट लाइट की समस्या बनी हुई है। कई जगह लाइट बंद पड़ी हैं, लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण अब तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया।
पार्षद ने तो यहां तक आरोप लगाया कि महापौर से शिकायत करने का भी कोई मतलब नहीं है। उनका कहना है कि यहां व्यक्ति देखकर काम किया जाता है। यदि एक निर्वाचित पार्षद को अपनी ही नगर निगम व्यवस्था में सुनवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठना पड़े, तो आम नागरिकों की परेशानी का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
इधर महापौर का जवाब भी व्यवस्था की एक दूसरी तस्वीर सामने रखता है।
हमारे सहयोगी पत्रकार से बातचीत में महापौर ने शहर में स्ट्रीट लाइट की कमी स्वीकार करते हुए बताया कि इस समस्या को लगातार दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि SPCL कंपनी का टेंडर समाप्त हो गया है और कंपनी आधा काम अधूरा छोड़कर चली गई, जिसके कारण शहर में लाइट व्यवस्था प्रभावित हुई है।
अब सवाल यह है कि यदि ठेकेदार कंपनी आधा काम छोड़कर चली गई, तो उसकी जवाबदेही किसने तय की? क्या नगर निगम के पास काम पूरा कराने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी? छह महीने से जनता अंधेरे में परेशानी झेल रही है, तो इस देरी की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक ही नगर निगम में महापौर और पार्षद के बीच ही समस्याओं को लेकर इतनी असहमति और अविश्वास दिखाई दे रहा है, तो शहर के विकास के लिए सामूहिक निर्णय कैसे लिए जाएंगे?
दुर्ग की जनता को नेताओं की गुटबाजी से कोई मतलब नहीं है। उसे रात में अपने मोहल्ले की सड़क पर रोशनी चाहिए। उसे सुरक्षित रास्ते चाहिए, साफ-सफाई चाहिए, बेहतर सड़कें चाहिए और मूलभूत सुविधाएं चाहिए।
जनता यह नहीं पूछती कि पार्षद किस गुट का है और महापौर किसके साथ हैं। जनता सिर्फ यह पूछती है कि उसके टैक्स और उसके वोट के बदले उसे सुविधाएं कब मिलेंगी?
राजनीति में गुट हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं और मतभेद भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन जब इन मतभेदों की कीमत शहर का विकास चुकाने लगे, तब यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, जनहित की अनदेखी बन जाता है।
दुर्ग नगर निगम के जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए नहीं, बल्कि शहर को बेहतर बनाने के लिए चुना है।
चुनाव के समय जनता का वोट चाहिए, लेकिन चुनाव के बाद जनता की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए भी समय होना चाहिए।
अब दुर्ग की जनता को बयान नहीं, समाधान चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप नहीं, जवाबदेही चाहिए। और सबसे जरूरी बात, गुटबाजी नहीं, शहर का विकास चाहिए।
क्योंकि जनता ने पार्षद और महापौर चुने हैं, राजनीतिक अखाड़े के पहलवान नहीं!

