बात दुर्ग के विकास की: गुटबाजी और निधि की कमी ने रोका दुर्ग का विकास! नेता व्यस्त खींचतान में, जनता रह गई परेशानी में……

शिवनाथ संवाद: दुर्ग। कभी छत्तीसगढ़ के विकसित शहरों की दौड़ में सबसे आगे रहने वाला दुर्ग, आज विकास के नाम पर ठहर गया है। एक ओर नगर निगम के पास योजनाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त निधि नहीं है, तो दूसरी ओर बड़े नेताओं के बीच गुटबाजी ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। विधायक गजेन्द्र यादव, महापौर अलका बाघमार और पूर्व सांसद सरोज पांडे जैसे प्रभावशाली नेताओं के बीच चल रही अदृश्य खींचतान का सीधा असर शहर के विकास पर साफ देखा जा सकता है।

शहर में बुनियादी सुविधाएं लड़खड़ा रही हैं — गलियों में कीचड़, जगह-जगह गड्ढे, जलभराव, खराब स्ट्रीट लाइटें और अधूरे पड़े निर्माण कार्य अब आम बात हो गई है। नगर निगम के अधिकारी चुप हैं, और आम जनता बेबस।

नगर निगम सूत्रों की मानें तो कई योजनाएं तो सिर्फ कागजों पर ही बनकर रह गईं क्योंकि विकास कार्यों के लिए न तो बजट है, और न ही सामूहिक निर्णय लेने की इच्छा शक्ति। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे पास योजनाएं हैं, लेकिन उनके लिए आवश्यक फंड ही नहीं है। ऊपर से राजनीतिक दखल इतना ज़्यादा है कि कोई फैसला लेना ही मुश्किल हो गया है।”

विकास की रफ्तार रुक चुकी है, लेकिन राजनीतिक रार तेज हो चुकी है। जनता को न सफाई मिल रही, न पानी, न रोशनी और न ही सड़क जैसी ज़रूरतें पूरी हो पा रही हैं। वार्ड स्तर पर निधि के अभाव में पार्षद भी हाथ बांधे बैठे हैं।

शहरवासियों का सीधा सवाल है — जब सब कुछ गुटबाजी और दलीय राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा, तो विकास कब और कैसे होगा? हर बार चुनाव से पहले बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन फिर शुरू हो जाता है ‘किसका वॉर्ड, किसका नाम, किसकी योजना’ का खेल।

अब सवाल यह है कि:
• क्या नेताओं के बीच की यह खींचतान कभी खत्म होगी?
• क्या नगर निगम को पर्याप्त निधि मिलेगी?
• क्या दुर्ग फिर से विकास की राह पर लौटेगा?

या फिर यह शहर फाइलों में ही विकसित होता रहेगा, और धरातल पर यूं ही पीछे छूटता जाएगा?

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